जाति का कर्ज

मैं अपनी सीमित और सहजबुद्धि से यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि किसी समुदाय को उसके पुरखों के किए के दंश से आखिर कब मुक्ति मिल जाती है? यह प्रश्न यूजीसी के नए नियमों के आने से फिर खड़ा हो गया है कि ब्राह्मण बच्चों के सिर पर लदा यह अनचाहा ‘ऋण’ न जाने कब उतरेगा?

यह सच है कि हिंदू समाज ने जाति-प्रश्न पर बहुत गंभीरता से विचार किया है और स्वयं में बहुत शिद्दत से सुधार किया है. हिंदू समाज ने समय के साथ अपने भीतर सुधार और निखार की जितनी गुंजाइश रखी है, उतना स्वीकार्यभाव संभवतः संसार के किसी समाज में न होगा. आरक्षण-व्यवस्था भी इसी क्रम में एक सोपान है, जिस पर छुटपुट असहमतियों के साथ हिंदू समाज में सहमति है. असहमति भी बुनियादी है. आरक्षण के क्रियान्वयन में कुछ बदलाव ताकि उसका लाभ ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच सके जिससे आरक्षण की सार्थकता सिद्ध हो.

पीड़ित समुदाय को ऊपर उठाने के हर संभव प्रयास के बावजूद भी पीड़ित समुदाय के भीतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी विषग्रंथि को जीवित रखने का क्या कारण हो सकता है? दशकों बाद भी हिसाब बराबर क्यों नहीं माना जा रहा?

संभवतः सामूहिक मानसिक तुष्टि के लिए अंतिम शरणस्थली यही शेष बचती है कि उस कथित शोषक समुदाय की अस्मिता को कुचला जाए और उसकी प्रतिष्ठा पर चढ़ाई की जाए. इस मनोवृत्ति के मूल से उपजे बयान इधर निरंतर सुनने को मिलते हैं. इधर आईएएस संतोष वर्मा ने कहा, “जब तक मेरे बेटे को ब्राह्मण अपनी बेटी दान नहीं दे तब तक आरक्षण रहना चाहिए.”

इस आग्रह के मूल में यौन-वर्चस्व की भावना है क्योंकि सवर्णों से कभी उनके बेटे नहीं मांगे जाएंगे बल्कि उनकी बेटियां ही मांगी जाएंगी. ‘रोटी-बेटी’ का नारा भी इसी कुरूप परिणति का ही संकेत है. यह समझना बहुत ज़रूरी है.

एक भिन्न संदर्भ में, अश्वेतों के विरुद्ध हुए भेदभाव के कारण वर्तमान में श्वेतों में हीनताबोध की विषबेल इस तरह से रोपी गई कि श्वेत स्त्रियों के साथ अश्वेत पुरुषों का एक कुरूप ‘पोर्न-साम्राज्य’ खड़ा किया गया. प्रतिशोध की बलवती भावना अंततः कब तुष्ट होगी? इस इंटररेशियल पोर्न का यह भी एक गंभीर पहलू है, जहां श्वेत स्त्रियों के ‘श्रेष्ठताबोध’ को कुचल डालने का वेग तीव्र होता है. यह वस्तुतः ‘रिवर्स ह्यूमिलिएशन’ है. शीलभंग कर अपमानित करने की कुत्सित चेष्टा.

पोर्न का यह अश्लील बाज़ार शत्रु की स्त्री पर यौन-वर्चस्व स्थापित कर उसके मानमर्दन का विद्रूप प्रयास है. हर दौर में मनुष्य के लिए विजय का अंतिम प्रतीक स्त्री को वस्तु की मानिंद जीतकर उस पर यौन अधिकार पाना रहा है.

क्या भारतीय संदर्भ में जाति के प्रश्न पर इस तरह के कुरूप परिप्रेक्ष्य उभारना चाहते हैं जहां सवर्णों की स्त्रियां ब्याही जाएंगी तभी समतामूलक समाज का निर्माण होगा?

समाज के एक-एक आदमी के भीतर से हर रूढ़ि जब तक समाप्त न हो जाए, उससे पहले बदलाव हुआ नहीं मानेंगे तो यह भिन्न दर्जे का ‘यूटोपिया’ है. इस तरह का बदलाव न तो जांचा जा सकता है और न ही ऐसा होना संभव है. मनुष्य के विकासक्रम में हज़ारों वर्ष बाद भी असमानता किसी न किसी रूप में रहेगी. अनुसूचित जाति स्वयं अपने से छोटी जाति खोजे बैठी है. अतः जाति न सही, किसी और तरह की ‘जाति’ मनुष्य गढ़ ही लेगा. यहां मेरा बिल्कुल यह कहना नहीं है कि जातिगत भेदभाव होना चाहिए. बल्कि कहना यह है कि सामाजिक-सुधार की एक गति होती है. हिंदू समाज उस गति से आगे ही चल रहा है. किन्तु राजनीति की मांग भेद मिटाना नहीं, बनाए रखना है.

इसलिए विषग्रंथि को सदैव जीवित रखने से राजनीतिक हित तो साधे जा सकते हैं लेकिन किसी राष्ट्र का भला नहीं हो सकता.


कुमार श्याम एक फ्रीलांस पत्रकार और यूट्यूबर हैं.